दुर्ग यूनिवर्सिटी M.A समाजशास्त्र || भारत मे नगरीय समाजशास्त्र|| Urban Society in India

समाजशास्त्र भारत मे नगरीय समाजशास्त्र।। Urban Society in India || M. A previous Exam preparation

(According to Durkheim’s “Social disintegration is an ancestral property of industrial revolution.”)



सामाजिक व्यवस्था पर दुर्खीम की धारणा (Durkheim’s Preoccupation with Social Order)



फ्रेंच समाजशास्त्री इमाइल दुर्खीम ने अपने सामाजिक विचारों से सामाजिक व्यवस्था (Social (Order) को भी अछूता नहीं रखा। उन्होंने अपने अध्ययनों में सामाजिक व्यवस्था को दृष्टिगत करते हुए स्पष्ट किया है कि समाज में रह रहे प्रत्येक प्राणी की कोई-न-कोई आवश्यकता अवश्य ही होती है। और इस आवश्यकता की पूर्ति मानव समाज में रहते हुए ही पूरा कर सकता है। दुर्खीम का मानना है। कि मानव अन्य प्राणियों की तुलना में एक सामाजिक प्राणी है और इस आधार पर आवश्यकताएँ भी इसी अनुरूप होती हैं जिसमें सामाजिक, राजनैतिक, सांस्कृतिक और आर्थिक आदि आवश्यकताएँ प्रमुख हैं। इन सभी की आपूर्ति समाज में रहते हुए ही की जा सकती है। अतः इन मानवीय आवश्यकताओं के आधार पर मानव को अपने समूह या समाज से सम्बन्ध स्थापित करना अति आवश्यक हो जाता है और यही पारस्परिक सम्बन्ध सामाजिक व्यवस्था के रूप में स्पष्ट दिखाई पड़ते हैं।



सामाजिक विघटन (Social Destruction)



सामूहिक संघटन और सामाजिक विघटन एक-दूसरे की अभिन्न अवधारणाएँ हैं अर्थात् ये दोनों ●सापेक्ष अवधारणाएँ हैं। समाज में जटिलता और तेज परिवर्तन के कारण सामंजस्य के दबाव और तनाव अधिक गहन होते जाते हैं और इन्हें छोड़ पाना इतना सरल नहीं होता और इसी के फलस्वरूप सामाजिक विघटन में वृद्धि होती जाती है। जिन सम्बन्धों के आधार पर समाज का निर्माण होता है, यदि उन्ही सम्बन्धों में शिथिलता के लक्षण विकसित होने लगें तो समाज का विघटन होना अवश्यम्भावी है। यद्यपि कोई भी समाज पूर्णरूप से न तो संगठित होता है और न ही पूर्णतया विघटित। जब लोगों के द्वारा समाज में रहते हुए अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए प्राप्ति साधनों में एकमत का अभाव पाया जाता है और लोगों के मन में यह द्वन्द्व चल रहा हो कि क्या करें और क्या नहीं करें, तब इस प्रकार की स्थिति को सामाजिक विघटन की संज्ञा दी जाती है। अन्य शब्दों में, स्पष्ट रूप से देखा जाये तो सामाजिक विघटन का अर्थ व्यवस्था के टूट जाने या सामाजिक ढाँचे के विभिन्न अंगों में एकता के अभाव से है।

सामाजिक विघटन की अवधारणाएँ (Concept of Social Destruction)

सामाजिक विघटन की अवधारणा को विभिन्न समाजशास्त्रियों ने अपने-अपने ढंग से अलग-अलग दृष्टिकोण से स्पष्ट रूप से परिभाषित किया है। सामाजिक विघटन उस समय उत्पन्न होता है जब शक्तियों के सन्तुलन में परिवर्तन होता है और सामाजिक संरचना इस प्रकार विखण्डित हो जाती है कि पूर्व में स्थापित प्रतिमान अब लागू नहीं होते और सामाजिक नियन्त्रण के स्वीकृत स्वरूप प्रभावपूर्ण ढंग से कार्य नहीं करते “

फेयरचाइल्ड ने लिखा है, “सामाजिक विघटन का कार्य स्थापित समूह व्यवहार प्रतिमानों, संस्थाओं या नियन्त्रणों की क्रियाशीलता में असन्तुलन तथा अव्यवस्था से है।” लेमर्ट के अनुसार, “सामाजिक संस्थाओं एवं समूहों के बीच असन्तुलन तथा व्यापक संघर्ष पैदा हो जाने का नाम ही सामाजिक विघटन है।”

उपर्युक्त सभी परिभाषाओं से स्पष्ट होता है कि सामाजिक विघटन एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके अन्तर्गत समूह अथवा समाज के सदस्यों के पारस्परिक सम्बन्ध टूटने लगते हैं और उनके व्यवहार को नियन्त्रित करने वाले आदर्शों एवं सामाजिक नियमों का प्रमाण शिथिल होने लगता है। परिणामस्वरूप सामाजिक संरचना का स्वरूप बिगड़ जाता है और संगठन को चोट पहुँचती है।

सामाजिक विघटन के कारण (Causes of Social Destruction)

इमाइल दुर्खीम ने समाज को परिभाषित करते हुए लिखा है कि जिन व्यक्तियों, समुदायों और समूहों से मिलकर समाज बनता है, उन सभी की कुछ आवश्यकताएँ भी होती है इसी कारण इनमें पारस्परिक सम्बन्ध बने रहते हैं। अचानक ये सभी अंग अपने-अपने कर्त्तव्यों को बन्द कर दें तो इनके सम्बन्धों में भी शिथिलता आ जायेगी और समाज भी विघटित हो जायेगा। इमाइल दुर्खीम ने अपने अध्ययन में सामाजिक विघटन के निम्नलिखित कारणों का उल्लेख किया है

(1) नियमहीनता (Anomie)

सामाजिक परिवर्तन के कारण सामाजिक संरचना परिवर्तित होती है और परिवर्तित सामाजिक संरचना के स्वरूप का प्रभाव व्यक्ति के कर्त्तव्यों एवं व्यक्तित्व पर भी पड़ता है। इस प्रभाव का कोई मापदण्ड नहीं होता, यह अच्छा और बुरा दोनों ही तरह का हो सकता है। अतः व्यक्ति का व्यवहार सामाजिक व्यवस्था के प्रति अनुकूल भी हो सकता है और प्रतिकूल भी। यह प्रतिकूल अवस्था ही साधारणतया नियमहीनता (Anomie) के नाम से जानी जाती है। दुर्खीम ने नियमहीनता के सम्बन्ध में लिखा है कि जब भी कोई अचानक परिवर्तन होता है तो समाज के नियन्त्रणात्मक नियमों की आदर्शात्मक संरचना ढीली पड़ जाती है और इस अवस्था में व्यक्ति को यह नहीं सूझता कि क्या गलत है अथवा क्या सही, उसकी इच्छाएँ अदम्य रूप में बढ़ जाती हैं और उनकी सन्तुष्टि के लिए वह विसंगति या नियमहीनता को अपनाता है।

सामाजिक व्यवस्था के अन्तर्गत जब तक व्यक्ति और समाज के मध्य अच्छा सामंजस्य बना रहता है तब तक मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति होती रहती है और किसी भी प्रकार से समाज और व्यक्ति के मध्य विरोध भावना का अभाव रहता है। लेकिन इसके विपरीत स्थिति में जब व्यक्ति के अन्तर्मन में समाज के प्रति यह भावना जाग्रत हो जाती है कि समाज उसकी मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति करने में सहायक सिद्ध नहीं हो रहा है तो उसके मन में निराशा, असंतोष और बदला लेने की भावना का उदय होता है और वह इन भावनाओं से प्रेरित होकर एक विशिष्ट प्रकार का व्यवहार करता है और यह व्यवहार ही नियमहीनता या विसंगति को चिन्हित करता है। व्यक्ति का यह व्यवहार सामाजिक व्यवस्था को विघटित करने में सहायक सिद्ध होता है और यह विसंगति या नियमहीनता ही सामाजिक विघटन का प्रमुख कारण होती है। दुर्खीम ने इस नियमहीनता या विसंगति की स्थिति को छूत की बीमारी की संज्ञा दी है। उनका मानना है कि नियमहीनता की स्थिति में व्यक्ति अपनी इच्छा के अनुसार अपनी आशाओं, अभिलाभाषाओं व आवश्यकताओं की अधिकतम पूर्ति करने में संलग्न रहता है। उसे समाज की कोई भी परवाह नहीं होती और न ही सामाजिक आदर्शों या मूल्य की

(2) विसंगति बम विभाजन (Anomie Division of Labour) –

दुर्बीम ने बम विभाजन की अवधारणा को स्पष्ट करते हुए लिखा है कि बम विभाजन समाज की प्रमुख आवश्यकता है और समाज को इससे लाभ भी होता है। लेकिन दूसरे पहलू से देखा जाये तो सामाजिकता के तत्वों के अभाव में श्रम के विभाजन में अव्यवस्थाओं का प्रादुर्भाव बढ़ता जाता है और इसी के रहते सामाजिक-आर्थिक सम्बन्धों को संगठित करने वाली कड़ी कमजोर हो जाती है, जिसके परिणामस्वरूप समाज में व्याधिकीय (Pathological) अवस्था का उदय होता है दुर्बीम के कथनानुसार अमर समाज में अस्वाभाविक और इच्छा के विपरीत श्रम विभाजन होता है तो उससे समाज में केवल अव्यवस्था और समस्याएँ ही उत्पन्न होती है न कि व्यवस्था और सुख

जब सामाजिक व्यवस्था में व्यक्ति को बिना इच्छा के श्रम विभाजन में कार्य करना होता है तो उस श्रम विभाजन को बलपूर्वक श्रम विभाजन (Forced Division of Labour) कहा जाता है। विभिन्न समाजशास्त्रियों का यह मानना है कि श्रम विभाजन स्वाभाविक और इव अनुरूप किया जाये तो इस श्रम विभाजन में समाज में एकता और संगठन के गुण परिलक्षित होते हैं और वही विपरीत स्थिति में किया गया हो तो समाज को विघटित करने में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन करता है। अन्ततः समाज में अव्यवस्था की स्थिति के अतिरिक्त और कुछ दिखाई नहीं पड़ता।



(3) आर्थिक विपदा (Economic Disaster)

सामाजिक व्यवस्था में आर्थिक विपदाओं का प्रभाव होता है तो समाज आर्थिक रूप से पिछड़ जाता है और निर्धनता के प्रादुर्भाव से सामाजिक नियमावली बिखर जाती है। सामाजिक जीवन में दुःखों का आगमन होता है। प्रत्येक व्यक्ति की यह इच्छा होती है कि वह आर्थिक रूप से सम्पन्न हो आर्थिक विपदा का अन्त वह विभिन्न साधनों के माध्यम से कर अपने जीवन को संकट मुक्त करने का प्रयास करता है, लेकिन ऐसा न हो पाने की स्थिति में एक शून्यता तथा दिशा अभाव की स्थिति का निर्माण होता है और समाज में विघटन के लक्षण प्रकट होने लगते हैं। इन लक्षणों की अधिकता में समाज विघटित होने लगता है। दुर्बीम का विश्वास है कि आर्थिक विपदा या संकट के कारण या गरीबी के कारण ही अव्यवस्था की स्थिति का जन्म होता है और यही स्थिति सामाजिक विघटन को बढ़ावा देती है।



(4) आर्थिक सम्पन्नता (Economic Prosperity)

दुर्खीम का यह दृढ विश्वास है कि आर्थिक रूप से सम्पन्न समाज भी अव्यवस्था का जनक है, क्योंकि आर्थिक रूप से मजबूत स्थिति में मानव की इच्छाओं का आकार बढ़ जाता है, जो निर्धनता की स्थिति में सीमित होता है, भौतिक साधनों का अधिक बोलबाला होता है। मानव की मानसिकता में परिवर्तन हो जाता है। अशान्ति को बढ़ावा मिलता है। सामाजिक सम्बन्धों में भी अस्थिरता के लक्षणों का प्रादुर्भाव होता है। सामाजिक विधानों में शिथिलता उत्पन्न हो जाती है। आर्थिक रूप से सम्पन्न समाजों में भौतिक साधनों की बहुलता के कारण अशान्ति व गम्भीर बीमारियों का उदय होता है। दुर्बीम का विचार है कि हमें केवल गरीबी को ही अव्यवस्था का कारण नहीं मान लेना चाहिए बल्कि आर्थिक रूप से सम्पन्नता भी सामाजिक विघटन का कारण हो सकती है। उनका कथन है कि गरीबी की स्थिति में व्यक्ति की इच्छाएँ सीमित होती है उसे किसी भी प्रकार की चिन्ता नहीं होती है। अधिक धन को कैसे सुरक्षित रखा जाये इस बात से वह बेफिक्र होता है, क्योंकि उसके पास उतना ही धन होता है जितने से उसकी सीमित आवश्यकताओं की पूर्ति हो जाये। दुर्खीम का कहना है कि अधिक धन भी व्यक्ति को गलत रास्ते पर चलने के लिए विवश कर देता है। वह न चाहते हुए भी ऐसे कार्यों को करता है जिसके परिणामस्वरूप जीवन में अव्यवस्था का जन्म होता है और यही अव्यवस्था सामाजिक विघटन को जन्म देती है।



(5) औद्योगिक क्रान्ति (Industrial Revolution)

औद्योगिक क्रान्ति का उदय 18वीं सदी में यूरोप में हुआ, जिसके परिणामस्वरूप वैज्ञानिक प्रगति और आर्थिक सम्पन्नता का प्रसार हुआ। औद्योगिक क्रान्ति के परिणामस्वरूप हुई आर्थिक सम्पन्ना को दुखन सामाजिक विघटन का प्रमुख कारण मानते हैं। दुर्खीम के शब्दों में, “सामाजिक विघटन औद्योगिक क्रान्ति की एक पैतृक (Legacy) सम्पत्ति है।” दुर्खीम ने औद्योगिक क्रान्ति के परिणामस्वरूप सामाजिक व्यवस्था में हुए दुष्परिणामों का वर्णन अग्रलिखित ढंग से किया है

(i) नगरीकरण (Urbanization)

औद्योगिक क्रान्ति के अनेक परिणामों में से नगरीकरण भी प्रमुख है। औद्योगीकरण के कारण अनेक नगरों का विकास हुआ। नगरों की ओर ग्रामीण क्षेत्रों का भी रुझान हुआ। इसके परिणामस्वरूप नगरीय जनसंख्या में असीमित वृद्धि हुई। अलग स्थानों से आयी जनसंख्या में प्राथमिक सम्बन्धों का अभाव देखा गया और सामुदायिक भावना का भी अभाव या जिसके रहते इस समाज में प्रत्येक व्यक्ति के सम्बन्ध केवल स्वार्थ भावना के आधार पर ही स्थापित होते हैं। इस सम्बन्धों में स्थिरता का अभाव रहता है। नगरीय सामाजिक व्यवस्था में व्यक्ति को केवल अपने स्वार्थों की चिन्ता रहती है, समुदाय की नहीं। व्यक्ति अपने कार्यों की पूर्ति करने के लिए अन्य व्यक्ति से कुछ समय के लिए जब तक कि उसका स्वार्थ हल न हो जाये प्राथमिक स्तर के सम्बन्धों का निर्माण बड़ी ही चतुराई के साथ स्थापित कर लेता है जिसका आभास सामने वाला व्यक्ति आसानी से नहीं कर पाता और स्वार्थपूर्ति के पश्चात् यह सम्बन्ध पूर्ण रूप से समाप्त हो जाता है। इस तरह के के व्यवहार व्यक्ति को सामाजिक नियमों की अवहेलना करने में सहायक होते हैं, जिसके परिणामस्वरूप सामाजिक नियन्त्रण में ही शिथिलता आ जाती है। भौतिक वातावरण का इतना अधिक प्रभाव होता है कि परिवार का नियन्त्रण पारिवारिक सदस्यों पर नहीं रह पाता है, जिसके कारण धार्मिक क्रियाओं को सम्पन्न करने में बाधा पहुँचती है और इसके अभाव में धार्मिक भावनाओं का अन्त होता है।

उपर्युक्त सभी कारणों को देखते हुए सामाजिक अव्यवस्था उत्पन्न होने के परिणामस्वरूप सामाजिक विघटन होना अति स्वाभाविक है।



(ii) संस्थागत परिवर्तन (Institutional Changes)

औद्योगीकरण के फलस्वरूप भारतीय सामाजिक संस्थाएँ भी प्रभावित हुई जिसमें प्रमुख विवाह और पारिवारिक व्यवस्था पर अधिक प्रभाव परिलक्षित हुआ। औद्योगिक क्रान्ति से पूर्व भारतीय समाज में जिस विवाह प्रणाली का प्रचलन या उसका स्वरूप दिन-प्रतिदिन परिवर्तित होता जा रहा है। वर्तमान व्यवस्था के अनुसार विवाह का निर्णय परिवार के मुखिया न लेकर युवक और युवतियाँ स्वयं ही लेने लगे हैं। चूँकि यह समाज पूँजीवादी समाज के अनुरूप है इसलिए व्यक्ति की पहली आवश्यकता अर्थ जुटाने की रहती है और अर्थ अर्जन करने के लिए अच्छे व्यवसाय की स्थापना व अच्छी नौकरी करने के लिए अधिक समय की आवश्यकता हुई और धीरे-धीरे विवाह करने की आयु भी बढ़ती गयी। इससे समाज में बाल विवाह की स्थिति भी समाप्त हो गयी। अपवादस्वरूप किसी-किसी समाज में अभी भी बाल-विवाह देखने को मिल जाते हैं। दुर्खीम के अनुसार, वैवाहिक प्रणाली में जातीय प्रभाव भी कम हुआ है। वर्तमान समाज में प्रेम विवाहों का प्रचलन अधिक देखने को मिल रहा है। ऐसे विवाहों पर माता-पिता का आशीर्वाद तो होता है, लेकिन उनकी इच्छा नहीं होती है, क्योंकि यह युवक और युवतियों द्वारा अपनी इच्छा अनुरूप किया गया विवाह होता है। इस प्रकार के विवाहों में तलाक (Divorces) होने के अधिक अवसर मौजूद रहते हैं जो परिवार व समाज को अव्यवस्थित करने में अधिक महत्वपूर्ण होते हैं।

औद्योगीकरण के परिणामस्वरूप परिवार संरचना भी प्रभावित हुई। आज अधिकांश परिवार गाँवों की अपेक्षा नगरों में रहना अधिक पसन्द करते हैं। कारण स्पष्ट है कि वहाँ इन्हें रोजगार के अधिक अवसर उपलब्ध होते हैं तथा अन्य भौतिक सुविधाएँ आसानी से सुलभ हो जाती हैं, लेकिन नगरों में रहने के कारण परिवार का स्वरूप पूर्व स्थिति में नहीं रह पाता है। अतः संयुक्त परिवार का एकाकी परिवार में परिवर्तन होना स्वाभाविक है और इसी कारण एकाकी परिवारों का प्रचलन तेजी से बढ़ता जा रहा है। इन परिवारों में स्त्रियों को भी पूर्णरूपेण स्वतन्त्रता प्राप्त हो जाती है। इससे स्व-सम्बन्ध, तलाक विवाहेत्तर यौन सम्बन्ध, फैशन का प्रादुर्भाव होता है। दुर्खीम परिवार की इन सभी अनियमितताओं

को सामाजिक विघटन का प्रमुख कारण मानते हैं। नगरीकरण के कारण नगरों में पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियों की संख्या कम होने से नगरीय समाज में व्यभिचार, वेश्यागमन और विभिन्न प्रकार के अपराध करने का अवसर मिलता है जिसके कारण समाज में अव्यवस्था का प्रादुर्भाव हो जाता है)



(iil) पूँजीवाद का प्रादुर्भाव (Emergence of Capitalism)

औद्योगिक क्रान्ति के परिणामस्वरूप संसार के सभी देशों के उद्योग जगत् में क्रान्ति आयी, जिसका प्रभाव प्रत्यक्ष रूप से बड़े-बड़े उद्योगों के रूप में देखा जा सकता है। नयी-नयी तकनीकी व्यवस्था पर उद्योगों के कारण औद्योगीकरण काबीज पनपा और देश के विभिन्न भागों में बड़े-बड़े कारखानों की स्थापना हुई और उत्पादन का स्तर भी बढ़ गया। वर्तमान औद्योगिक प्रणाली के अन्तर्गत कम श्रमिकों के आधार पर उत्पादन किया जा सकता है। उन्नत तकनीकों के माध्यम से व्यक्ति को अधिक-से-अधिक धन अर्जित करने में शारीरिक श्रम नगण्य रूप से करना पड़ता है। इस प्रकार देखा जाये तो धन का व्यय कम और आमदनी अधिक होने के कारण व्यक्ति के पास पूँजीवाद का प्रादुर्भाव हो रहा है।



(iv) बम विभाजन का विशेषीकरण (Division of Labour and Specialization)

दुर्खीम ने श्रम विभाजन को एक सामाजिक घटना के रूप में स्वीकार किया है। उनका मानना है कि श्रम-विभाजन प्रत्येक युग में सभी समाजों की आवश्यक विशेषता रही है। पूर्व में श्रम विभाजन का आधार आर्थिक न होकर सामाजिक ही था। उस समय केवल आयु और लिंग के आधार पर ही श्रम | विभाजन की व्यवस्था विद्यमान थी। सामाजिक विकास की प्रक्रिया के बाद में अनेक ऐसी स्थितियों ने जन्म लिया जिनके परिणामस्वरूप श्रम विभाजन को प्रोत्साहन मिला। दुर्खीम के अनुसार, श्रम विभाजन का प्रत्यक्ष सम्पर्क जनसंख्या के घनत्व से है। जनसंख्या वृद्धि के पश्चात् अनेक आवश्यकताओं का प्रादुर्भाव हुआ, जिसके कारण आर्थिक उत्पादन हेतु बड़े-बड़े उद्योगों की स्थापना का अनुभव किया गया और जो मानवीय आवश्यकताओं की पूर्ति करने में सक्षम सिद्ध हुआ और इस कार्य में औद्योगिक क्रान्ति की अहम् भूमिका रही। उद्योगों में श्रम विभाजन की प्रणाली लागू करने से व्यक्ति के अन्दर एक ही कार्य करने के कारण विशेषता का भी प्रादुर्भाव हुआ, जिसके फलस्वरूप समाज में एक कार्य को दक्षता के साथ करने वाले लोगों की संख्या में वृद्धि हुई। इस दक्षता का विशेष अनुभव के कारण समाज में व्यक्ति की अलग ही पहचान बन गई और उसका जीवन स्तर पहले से अधिक श्रेष्ठ हो गया। दुर्खीम का मानना है कि श्रम विभाजन से जहाँ एक तरफ अच्छे परिणाम निकले वहीं दूसरी ओर दुष्परिणाम भी सामने आ रहे हैं। पूँजीवाद के कारण आर्थिक संकट तथा श्रमिकों से सम्बन्धित अनेक समस्याओं का जनक औद्योगिक क्रान्ति ही है। इन समस्याओं की अधिकता के फलस्वरूप सामाजिक विघटन को प्रोत्साहन मिला है।



(v) सामाजिक ढाँचे में परिवर्तन (Change in Social Structure)

तीव्र गति से परिवर्तित हो रहे समाजों में सामाजिक संरचना के तत्व भी तेजी से परिवर्तित हो रहे हैं, जिन्हें प्रत्यक्ष रूप से ग्रामीण सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था में देखा जा सकता है। जहाँ ग्रामीण लोगों का व्यवसाय कृषि और कुटीर उद्योग हुआ करते थे वहीं आज विकसित तकनीकी व्यवस्था के कारण इनके कार्यों में भी परिवर्तन हो रहा है। ग्रामीण क्षेत्र के लोग हस्तशिल्प कला व अन्य ऐसे कार्य जो बिना मशीनों के सम्भव थे, उनके आधार पर अपनी जीविका चला रहे थे। औद्योगिक क्रान्ति के परिणामस्वरूप औद्योगीकरण हुआ और बड़े-बड़े उद्योगों की स्थापना हुई, जिसके कारण ग्रामीण व्यवसाय प्रभावित हुए, क्योंकि मशीनों द्वारा बनी वस्तुओं में अधिक आकर्षण और कम लागत मूल्य के कारण यह ग्रामीणों द्वारा बनाई गयी वस्तुओं को पछाड़ने में कारगर सिद्ध हुए। इन उद्योगों का ग्रामीण क्षेत्रों में बोलबाला होने के पश्चात् ग्रामीण उद्योगों का ह्रास होने लगा और धीरे-धीरे इनकी सामाजिक भूमिका भी परिवर्तित होने लगी जिसके फलस्वरूप समाज में विघटन की स्थिति का जन्म हुआ।



(vi) वर्ग-संघर्ष तथा नये वर्गों का प्रादुर्भाव (Class Struggle and Emergence of New Classes)–

वर्तमान सामाजिक व्यवस्था का स्वरूप अतीत की सामाजिक व्यवस्था से भिन्न नजर आ रहा है। वर्तमान समय में औद्योगिक क्रान्ति के कारण और शिक्षा के प्रसार के फलस्वरूप व्यक्ति की सामाजिक स्थिति बदल रही है। यह धारणा अब अपवाद बनकर रह गयी है कि अमुक कार्य अमुक व्यक्ति के लिए ही निश्चित है। आज व्यक्ति शिक्षा के माध्यम से अपनी सामाजिक स्थिति को आसानी से परिवर्तित कर रहा है। पूर्व समाज में ब्राह्मणों की स्थिति मजबूत व श्रेष्ठ मानी जाती थी, लेकिन आज वे व्यक्ति भी श्रेष्ठ स्थिति में हैं जो समाज में हीनदृष्टि से देखे जाते थे। आज अधिकांश पदों पर हीन दशा वाले व्यक्ति सम्मानस्वरूप आसीन हैं। इसी वर्ग (अस्पृश्य) से अधिकांश डॉक्टर, वकील, -प्रोफेसर, इंजीनियर, जज और संघ लोक सेवा आयोग द्वारा आयोजित भारतीय प्रशासनिक सेवाओं में सफल होकर श्रेष्ठ पदों पर आसीन हो रहे हैं। लेकिन अभी भी शिक्षा के अभाव समाज के अन्तर्गत श्रेष्ठ समझे जाने वाले लोग चपरासी, क्लर्क, मजदूर और घरेलू नौकर बनकर ही रह गये हैं।

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